सीधी भर्ती भी सही

संपादकीय

निस्संदेह 21वीं सदी के भारत में वैश्विक मानकों के अनुरूप शिक्षा व प्रशासनिक व्यवस्था में विशेषज्ञों की दरकार है, जो आधी सदी पुरानी औपचारिक पात्रता के मापदंडों से मुक्त हों। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि नई व्यवस्था धनबल, राजनीतिक प्रभाव व अन्य किसी दबाव से प्रभावित न हो। यह जानते हुए कि देश में बड़ी आर्थिक विषमता है और सदियों से वंचित समाज को संविधान ने आगे बढ़ने के लिये विशेष अवसर दिये हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि संवैधानिक मापदंडों के अनुरूप कानून सम्मत रोजगार चयन प्रक्रिया में चतुर-चालाक व धनबल के उपासक छिद्र तलाश लेते हैं। पारदर्शिता के मानकों व चयन प्रक्रिया को धता बता कर अकसर चयन परीक्षाओं के पेपर आउट होने से लेकर साक्षात्कार में धांधली के मामले उजागर होते रहते हैं। बहरहाल, पिछले दिनों दो फैसलों ने सबका ध्यान खींचा। पहला यह कि देश के विश्वविद्यालयों व उच्चतर शैक्षणिक संस्थानों के स्नातक एवं स्नातकोत्तर कार्यक्रमों में विदेशी छात्रों के नामांकन के लिये 25 फीसदी अतिरिक्त सीटें सृजित करने की अनुमति दी जायेगी। साथ ही विदेशी विद्यार्थियों को भारत में दाखिले के लिये प्रवेश परीक्षा नहीं देनी होगी। पहली बार सुनने में अच्छा लगता है कि फैसला देश की वैश्विक स्तर पर शैक्षिक प्रतिष्ठा बढ़ायेगा। दुर्लभ विदेशी मुद्रा का अर्जन होगा। लेकिन बिना परीक्षा के प्रवेश देने के नुकसान भी बने रहेंगे। इससे उन धनाढ्य विदेशी परिवारों के बच्चों को डिग्री लेने का सुगम अवसर मिल जायेगा, जो अपने देश में इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश नहीं ले पाते। निस्संदेह, इससे डिग्री की गुणवत्ता व शैक्षिक परिदृश्य पर प्रभाव पड़ सकता है। वहीं दूसरे फैसले में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की हाल ही में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि विश्वविद्यालय व उच्च शिक्षण संस्थान शीघ्र ही स्थापित विशेषज्ञों को एक नई श्रेणी के तहत फैकल्टी मेंबर के रूप में नियुक्त कर सकेंगे जिनके लिये औपचारिक अकादमिक पात्रता एवं प्रकाशन से जुड़ी शर्त अनिवार्य नहीं होगी।

दरअसल, नीति-नियंताओं का मानना है कि पेशेवर प्रोफेसरों वाली इस योजना में इंजीनियरिंग, विज्ञान, मीडिया, साहित्य, उद्यमित्ता, सामाजिक विज्ञान, ललित कला,लोक सेवा व सशस्त्र बल आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञ इस श्रेणी में नियुक्ति पा सकेंगे। विषय में विशेषज्ञता व लंबा अनुभव वरिष्ठ स्तर पर होना अनिवार्य होगा। साथ ही जरूरी है कि दायित्व निभाने का कौशल भी उनके पास हो। ये नियुक्तियां तीन श्रेणियों में होंगी। वहीं ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की संख्या मंजूर पदों से दस फीसदी से अधिक नहीं होगी। 

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